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India Deep Research · 0 sources Sep 22, 2026 · min read

पत्नी की एक इच्छा ने पति को अदालत पहुंचाया; हाई कोर्ट बोला-घरजमाई अपराध नहीं

एक शादी। एक इच्छा। और एक तलाक की अर्जी। झारखंड की एक अदालत ने उस मामले में फैसला सुनाया है, जिसने पारिवारिक रिश्तों की उस पुरानी सोच को हिला दिया है, जिसमें घरज...

Rajendra Singh

Rajendra Singh

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पत्नी की एक इच्छा ने पति को अदालत पहुंचाया; हाई कोर्ट बोला-घरजमाई अपराध नहीं
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TL;DR — Quick Summary

झारखंड में एक महिला ने अपने पति से घरजमाई बनकर रहने की इच्छा जताई। पति ने इसे अपमान मानकर तलाक की अर्जी दाखिल कर दी। हाई कोर्ट ने अर्जी खारिज करते हुए साफ किया कि घरजमाई रहना कोई अपराध नहीं है।

Key Facts
Main Update
झारखंड हाई कोर्ट ने पत्नी की घरजमाई इच्छा को तलाक का आधार मानने से इनकार किया।
Impact
यह फैसला पारिवारिक मामलों में पति-पत्नी के अधिकारों और सामाजिक मान्यताओं पर सवाल उठाता है।
Official Response
अदालत ने कहा कि घरजमाई रहना अपराध नहीं, यह व्यक्तिगत पसंद का मामला है।
Current Status
पति की तलाक अर्जी खारिज कर दी गई है।
What Next
यह फैसला भविष्य के पारिवारिक विवादों में संदर्भ बन सकता है।

एक शादी। एक इच्छा। और एक तलाक की अर्जी। झारखंड की एक अदालत ने उस मामले में फैसला सुनाया है, जिसने पारिवारिक रिश्तों की उस पुरानी सोच को हिला दिया है, जिसमें घरजमाई रहने को पुरुष की 'हार' माना जाता है।

मामला झारखंड का है, जहां एक महिला ने अपने पति से कहा कि वह उसके घर में घरजमाई बनकर रहे। पति को यह बात इतनी नागवार लगी कि उसने अदालत में तलाक की अर्जी लगा दी। लेकिन हाई कोर्ट ने उसकी अर्जी को खारिज करते हुए एक साफ संदेश दिया—घरजमाई रहना कोई अपराध नहीं है।

पत्नी की इच्छा, पति की नाराजगी—मामला क्या था

जानकारी के मुताबिक, महिला ने अपने पति के सामने यह इच्छा रखी कि वह उसके मायके या उसके घर में घरजमाई के रूप में रहे। पति ने इसे अपनी मर्दानगी पर सवाल और सामाजिक अपमान माना। उसने तलाक के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया।

लेकिन अदालत ने पाया कि घरजमाई रहने की इच्छा किसी अपराध, क्रूरता या मानसिक प्रताड़ना की श्रेणी में नहीं आती। यह पति-पत्नी के बीच एक सामान्य सहमति का विषय हो सकता है, न कि तलाक का आधार।

हाई कोर्ट ने क्यों कहा—घरजमाई अपराध नहीं

अदालत का मानना है कि शादी में पति और पत्नी दोनों की भूमिकाएं बदल सकती हैं। अगर पत्नी अपने घर में रहने की इच्छा जता सकती है, तो पति से घरजमाई बनने की इच्छा जताना भी उतना ही वैध है। इसे अपमान या मानसिक क्रूरता नहीं कहा जा सकता।

कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि तलाक तभी दिया जा सकता है जब रिश्ते में क्रूरता, विश्वासघात या ऐसी परिस्थितियां हों जिनसे साथ रहना असंभव हो जाए। सिर्फ एक इच्छा या सामाजिक रिवाज से हटकर सोचना तलाक का आधार नहीं बन सकता।

यह फैसला आम लोगों के लिए क्यों मायने रखता है

भारतीय समाज में घरजमाई को अक्सर पुरुष की कमजोरी या निर्भरता का प्रतीक माना जाता है। कई परिवारों में यह मुद्दा हंसी-मजाक या ताने का विषय बनता है। ऐसे में यह फैसला उस सोच पर सवाल उठाता है, जो पुरुषों को भी एक तयशुदा भूमिका में बांधती है।

यह उन महिलाओं के लिए भी राहत की बात है, जो चाहती हैं कि उनका पति उनके परिवार के साथ रहे। अदालत ने साफ किया कि ऐसी इच्छा जताना किसी अपराध से कम नहीं, बल्कि एक अधिकार है।

सामाजिक सोच बनाम कानूनी सच्चाई

कानून की नजर में शादी एक समान साझेदारी है। न पति का यह अधिकार है कि वह पत्नी से सिर्फ अपने घर में रहने की उम्मीद करे, और न पत्नी का यह दायित्व कि वह हर हाल में पति के घर में ही रहे। घरजमाई रहना एक व्यवस्था है, जिसे अपनाया जा सकता है—थोपा नहीं जा सकता।

लेकिन अदालत ने यह भी माना कि अगर कोई पति घरजमाई रहने के लिए मजबूर महसूस करता है और इससे उसका मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित होता है, तो वह अलग मामला हो सकता है। फिलहाल, इस केस में ऐसा कुछ साबित नहीं हुआ।

क्या कहता है कानून—तलाक के आधार क्या हैं

हिंदू विवाह अधिनियम और अन्य पारिवारिक कानूनों के तहत तलाक के लिए क्रूरता, परित्याग, धर्मांतरण, मानसिक विकार, संक्रामक रोग जैसे ठोस आधार जरूरी हैं। सिर्फ जीवनशैली या रहने की जगह को लेकर असहमति तलाक का वैध आधार नहीं मानी जाती।

इस मामले में अदालत ने पाया कि पति की ओर से दिया गया कोई भी तर्क क्रूरता की श्रेणी में नहीं आता। इसलिए अर्जी खारिज कर दी गई।

क्या कहते हैं जानकार—विशेषज्ञों की राय

पारिवारिक मामलों के वकीलों का मानना है कि यह फैसला उस बदलती सोच का हिस्सा है, जिसमें पति-पत्नी की भूमिकाएं अब तय नहीं रहीं। हालांकि, कुछ का यह भी कहना है कि ऐसे मामलों में अदालत को यह भी देखना चाहिए कि कहीं पति को जबरन घरजमाई बनने के लिए मजबूर तो नहीं किया जा रहा।

लेकिन इस केस में अदालत ने साफ किया—इच्छा जताना और मजबूर करना, दोनों अलग बातें हैं।

क्या साबित हुआ, क्या अब भी सवालों में है

साबित: पत्नी ने घरजमाई रहने की इच्छा जताई। पति ने तलाक की अर्जी दी। हाई कोर्ट ने अर्जी खारिज की।

स्पष्ट नहीं: पति ने किन आधारों पर क्रूरता का दावा किया, यह सार्वजनिक तौर पर विस्तार से सामने नहीं आया। मामले की सुनवाई की तारीखें और बेंच की संरचना भी उपलब्ध जानकारी में सीमित है।

जोखिम और दूसरा पक्ष—क्या यह फैसला सबके लिए ठीक है

हर फैसले की तरह इसके भी दो पहलू हैं। एक ओर, यह पुरुषों को घरजमाई रहने से जुड़े सामाजिक तानों से मुक्ति दिलाने की दिशा में एक कदम है। दूसरी ओर, कुछ लोग इसे पति की भावनाओं की अनदेखी के रूप में देख सकते हैं।

अदालत ने संतुलन बनाते हुए यह नहीं कहा कि पति को हर हाल में घरजमाई बनना ही होगा। बल्कि यह कहा कि सिर्फ इच्छा जताने भर से तलाक नहीं मिल सकता।

आगे क्या—क्या बदलेगा इस फैसले से

यह फैसला भविष्य में उन मामलों में संदर्भ बन सकता है, जहां पति-पत्नी के बीच रहने की जगह या भूमिकाओं को लेकर विवाद होता है। हालांकि, हर मामला अपने तथ्यों पर खरा उतरता है, इसलिए इसे सीधे तौर पर सभी केसों पर लागू नहीं माना जा सकता।

जो साफ है—अदालत ने यह संदेश दिया है कि शादी में पति और पत्नी, दोनों की पसंद और असहमति को बराबर जगह मिलनी चाहिए।

Our Take

यह मामला सिर्फ एक तलाक की अर्जी नहीं था। यह उस सामाजिक सोच की परीक्षा थी, जो पुरुषों को भी एक खांचे में फिट करती है। अदालत ने यह नहीं कहा कि घरजमाई रहना हर पति के लिए जरूरी है। उसने बस इतना कहा—इसे अपराध मानकर तलाक मांगना गलत है। यह फैसला धीरे-धीरे बदलती भारतीय पारिवारिक सोच का एक और पड़ाव है।

Frequently Asked Questions

क्या घरजमाई रहने से तलाक मिल सकता है?

नहीं। अदालत के मुताबिक, सिर्फ घरजमाई रहने की इच्छा या मांग तलाक का वैध आधार नहीं है। तलाक के लिए क्रूरता या अन्य ठोस कानूनी आधार जरूरी हैं।

क्या पत्नी अपने पति से घरजमाई रहने को कह सकती है?

हां। कानूनन पति-पत्नी दोनों को अपनी इच्छा जताने का अधिकार है। लेकिन किसी को जबरन मजबूर करना अलग मामला हो सकता है।

इस मामले में हाई कोर्ट ने क्या फैसला दिया?

झारखंड हाई कोर्ट ने पति की तलाक की अर्जी खारिज कर दी और कहा कि घरजमाई रहना अपराध नहीं है।

क्या यह फैसला सभी राज्यों पर लागू होगा?

हाई कोर्ट का फैसला उस राज्य के अधिकार क्षेत्र में मार्गदर्शक होता है। अन्य राज्यों की अदालतें इसे संदर्भ के तौर पर देख सकती हैं, लेकिन हर मामला अलग होता है।

Rajendra Singh

Written by

Rajendra Singh

Rajendra Singh Tanwar is a staff correspondent at News Headline Alert, one of India's digital news platforms covering national and state developments across politics, health, business, technology, law, and sport. He reports on government decisions, policy announcements, corporate developments, court rulings, and events that affect people across India — drawing on official documents, named sources, expert commentary, and verified public records. His work spans breaking news, policy analysis, and public interest reporting. Before each article is published, it is reviewed by the News Headline Alert editorial desk to ensure accuracy and editorial standards are met. Corrections, sourcing queries, and editorial feedback can be directed to editorial@newsheadlinealert.com.