सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा कदम उठाते हुए NCLT (नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल) में रेज़ोल्यूशन प्लान को मंज़ूरी देने में हो रही देरी पर खुद (suo motu) संज्ञान लिया है। कोर्ट ने इस स्थिति को 'बेहद गंभीर' बताया है और चेतावनी दी है कि इस तरह की देरी से इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC) के मकसद पर ही सवाल उठ सकते हैं।
क्या है पूरा मामला? SC ने क्यों लिया Suo Motu संज्ञान?
Business Standard के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने NCLT में रेज़ोल्यूशन प्लान की मंज़ूरी में हो रही देरी को लेकर खुद संज्ञान लिया। कोर्ट ने कहा कि लंबी समयसीमा IBC के उद्देश्यों को कमज़ोर कर सकती है। ये मामला इसलिए अहम है क्योंकि IBC का मकसद कंपनियों का जल्द से जल्द रेज़ोल्यूशन करना है, लेकिन NCLT में देरी से ये प्रक्रिया प्रभावित हो रही है।
कोर्ट ने क्या कहा? 'Extremely Grim' स्थिति
Live Law की रिपोर्ट के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने NCLT में रेज़ोल्यूशन प्लान को मंज़ूरी देने में हो रही देरी पर 'बेहद गंभीर' (extremely grim) टिप्पणी की। कोर्ट ने इस मामले को suo motu लेते हुए कहा कि ये देरी पूरे इन्सॉल्वेंसी सिस्टम के लिए चिंता का विषय है।
IBC के मकसद पर क्या असर?
सुप्रीम कोर्ट का ये कदम IBC के मूल उद्देश्य को लेकर गंभीर सवाल उठाता है। IBC का मकसद कंपनियों का समय पर रेज़ोल्यूशन करना और कर्ज वसूली को तेज़ करना है। लेकिन NCLT में लंबित मामलों और मंज़ूरी में देरी से ये प्रक्रिया धीमी पड़ रही है। कोर्ट ने चेतावनी दी है कि अगर ये देरी जारी रही तो IBC का पूरा मकसद ही खतरे में पड़ सकता है।
हमारी बात: ये केस क्यों है अहम?
हमारी नज़र में, सुप्रीम कोर्ट का ये suo motu संज्ञान एक बहुत बड़ा संकेत है। ये दिखाता है कि कोर्ट NCLT में हो रही देरी को लेकर कितना गंभीर है। IBC एक ऐसा कानून है जिसे कंपनियों के कर्ज के जाल से निकलने का रास्ता दिखाने के लिए बनाया गया था। लेकिन अगर NCLT में ही मामले अटके रहेंगे, तो इस कानून का कोई फायदा नहीं रहेगा। ये केस आने वाले समय में NCLT के काम करने के तरीके में बड़ा बदलाव ला सकता है।