28 मई 1965 की वो रात धनबाद के लिए हमेशा के लिए काली रात बन गई। उस रात धोरी कोलियरी में जो कुछ हुआ, उसने पूरे देश को हिला कर रख दिया। मजदूर अपनी शिफ्ट खत्म कर घर लौटने की तैयारी में थे, तभी अचानक एक भयानक धमाका हुआ। खदान के तीनों मुहानों से लावा और आग की लपटें फूट पड़ीं। 268 मजदूर उस आग में जिंदा जल गए। यह भारत के इतिहास का दूसरा सबसे बड़ा खदान हादसा था, जिसकी दर्दनाक कहानी आज भी लोगों की आंखों को नम कर देती है।
धोरी कोलियरी में क्या हुआ था उस रात?
बात 27-28 मई 1965 की दरमियानी रात की है। धनबाद जिले के पास स्थित धोरी कोलियरी में मजदूर अपने काम में लगे हुए थे। कुछ मजदूर अपनी शिफ्ट खत्म करके बाहर निकल रहे थे। तभी रात करीब 12:45 बजे खदान के अंदर एक जोरदार विस्फोट हुआ। यह विस्फोट इतना भयानक था कि खदान के तीनों मुहानों से आग और लावा बाहर निकल आया। आग की लपटें दूर-दूर तक फैल गईं।
क्यों हुआ यह भीषण हादसा?
हादसे के बाद हुई जांच में सामने आया कि खदान के अंदर मीथेन गैस जमा हो गई थी। इस गैस में किसी चिंगारी या स्पार्क की वजह से विस्फोट हो गया। कोयला खदानों में मीथेन गैस का जमा होना एक आम समस्या है, लेकिन उस समय सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम नहीं थे। विस्फोट के बाद खदान के अंदर आग इतनी तेजी से फैली कि मजदूरों के पास बाहर निकलने का कोई मौका नहीं बचा।
268 मजदूरों की दर्दनाक मौत
इस हादसे में 268 मजदूरों और कर्मचारियों की मौत हो गई। कई शव इतने बुरी तरह जल गए थे कि उनकी पहचान तक नहीं हो पाई। परिवार वाले अपनों की तलाश में खदान के बाहर जमा हो गए थे। उनकी चीख-पुकार से पूरा माहौल गमगीन हो गया था। यह हादसा सिर्फ एक संख्या नहीं है, बल्कि 268 परिवारों की टूटी हुई जिंदगियों की कहानी है।
हादसे के बाद क्या हुआ?
हादसे की खबर जैसे ही फैली, पूरे देश में शोक की लहर दौड़ गई। तत्कालीन सरकार ने मुआवजे और राहत कार्यों की घोषणा की। लेकिन किसी भी मुआवजे से उन परिवारों का दुख कम नहीं हो सकता था, जिन्होंने अपने सब कुछ खो दिया था। इस हादसे ने कोयला खदानों में सुरक्षा मानकों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए।
धोरी हादसा: भारत का दूसरा सबसे बड़ा खदान हादसा
धोरी कोलियरी हादसा भारत के इतिहास में दूसरा सबसे बड़ा खदान हादसा है। इससे पहले 1960 में धनबाद के पास ही चुरुलिया खदान में भी भीषण हादसा हुआ था, जिसमें 175 मजदूरों की जान गई थी। धोरी हादसे ने कोयला उद्योग में सुरक्षा को लेकर एक बड़ा सबक दिया, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
क्या सीख मिली इस हादसे से?
धोरी हादसे के बाद कोयला खदानों में सुरक्षा के नियमों को कड़ा करने की मांग उठी। गैस डिटेक्शन सिस्टम, वेंटिलेशन और आपातकालीन निकासी के प्रबंधों पर ध्यान दिया गया। लेकिन आज भी देश की कई खदानों में सुरक्षा के मानक सही नहीं हैं। यह हादसा हमें याद दिलाता है कि मजदूरों की सुरक्षा को कभी हल्के में नहीं लेना चाहिए।
आज भी जिंदा है दर्द
आज भी धनबाद के बुजुर्ग उस रात को याद करके भावुक हो जाते हैं। उनके मुताबिक, उस रात आसमान में आग के गोले दिखाई दे रहे थे और पूरे इलाके में चीख-पुकार मच गई थी। यह सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि एक ऐसा जख्म है जो आज भी हरा है।
FAQs
धोरी खदान हादसा कब और कहां हुआ था?
यह हादसा 28 मई 1965 की रात धनबाद (तब बिहार, अब झारखंड) की धोरी कोलियरी में हुआ था।
धोरी खदान हादसे में कितने मजदूर मारे गए थे?
इस हादसे में 268 मजदूरों और कर्मचारियों की मौत हुई थी। यह भारत का दूसरा सबसे बड़ा खदान हादसा है।
धोरी खदान हादसे का क्या कारण था?
हादसे का कारण खदान के अंदर मीथेन गैस का विस्फोट बताया गया था। इस विस्फोट के बाद आग इतनी तेजी से फैली कि मजदूर बाहर नहीं निकल पाए।
धोरी हादसे के बाद क्या बदलाव आए?
इस हादसे ने कोयला खदानों में सुरक्षा मानकों को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए। इसके बाद गैस डिटेक्शन और वेंटिलेशन जैसे सुरक्षा उपायों पर जोर दिया गया।